अरुण खरे
सारे देश की निगाहें आने वाले कल के घटनाक्रमों और बदलने वाले राजनीतिक परिदृश्य की कल्पना में खोई है। मंगलवार को दोपहर बाद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह न्यूयार्क से स्वदेश पहुंचने वाले हैं। उनकी अनुपस्थिति में शुक्रवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एक नाटकीय घटनाक्रम में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाले मंत्रिमंड़ल के दागियों को बचाने वाले एक अध्यादेश को बकवास करार देकर सरकार को संकट में डाल दिया है।
अब कांग्रेस सहित देश भर को अगले एक दो दिनों के घटनाक्रम की प्रतीक्षा है। क्या कांग्रेस के पीएम इन वेटिंग राहुल गांधी पार्टी के सर्वोच्च नेता साबित हो जाएंगे या प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कांग्रेस की सोच को दरकिनार कर अध्यादेश के पीछे जमकर खड़े रहेंगे या पार्टी के कूटनीतिक विशेषज्ञ बीच का कोई रास्ता निकालेंगे। कांग्रेस में हालांकि सोमवार को कोई भी बड़ा नेता इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से बचता रहा लेकिन कर्नाटक के मांड्या में सोमवार को ही पार्टी की रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने साफ कर दिया कि पूरी कांग्रेस पार्टी प्रधानमंत्री के साथ खड़ी है। इस थोड़ा बदले घटनाक्रम से यह संकेत भी जाता है कि शायद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कोई बड़ी प्रतिक्रिया न देने का मन बना चुके हैं। सूत्रों की मानें तो पार्टी में राहुल गांधी के बयान को लेकर दो खेमें बन चुके हैं एक पीएम के पक्ष में दूसरा राहुल गांधी के समर्थन में। हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के कर्नाटक में दिए भाषण के बावजूद कांग्रेस में अभी तक कहीं से प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के फैसले का बचाव की आवाज नहीं उठी है। इस सारे घटनाक्रम में अब लोगों और तमाम राजनीतिक दलों के बीच इस बात की प्रतीक्षा की जा रही है कि कांग्रेस का असली और वास्तबिक नेता कौन साबित होता है, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी?, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी या प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह? कांग्रेस के भीतर मचे इस घमासान में सबकी नजरें इस पर लगी हैं कि अगले दो दिन में क्या होता है। लोगों के जेहन में अनेक सवाल जन्म ले रहे हैं कि क्या राहुल गांधी के बयान से आहत प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह इस्तीफा दे देंगे और कांग्रेस उनकी जगह किसी को नया प्रधानमंत्री नियुक्त कर देगी? क्या सोमवार को कर्नाटक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पीएम के पक्ष में खडे होने की घोषणा के बाद मंगलवार को राहुल गांधी प्रधानमंत्री से अपने बयान के लिए क्षमा मांग कर मामले को खत्म कर देंगे और प्रधानमंत्री भी कैबिनेट की बैठक बुलाकर अध्यादेश वापस लेने का फैसला कर लेंगे? एक संभावना और भी व्यक्त की जा रही है कि पिछले चार साल से लगातार पार्टी के भीतर अपनी अवमानना से आहत प्रधानमंत्री इस्तीफा देने से न केवल इंकार कर दें वरन अध्यादेश पर भी अड़ जाएं? ज्यादा जोर पड़ने पर मंत्रिमंडल का इस्तीफा ही राष्ट्रपति को सौंप कर आम चुनाव का रास्ता साफ कर दें? उधर कुछ सूत्रों का दावा है कि पहली बार किसी राष्ट्रीय मसले पर सार्वजनिक रूप से बोलने वाले कांग्रेस उपाध्यक्ष किसी भी हालत में न तो अपना बयान वापस लेने को तैयार होगे और न ही अध्यादेश को लागू करने के पक्ष में तैयार होंगे। यदि सचमुच ऐसा होता है तो क्या होगा? इसी पर देश की निगाह टिकी है।
01Oct- 2013

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