अब गेंद प्रधानमंत्री के पाले में
अरुण खरे
दागी सांसदों व विधायकों को बचाने वाले अध्यादेश के खिलाफ कांग्रेस के सबसे ताकतवर नेता राहुल गांधी के नाटकीय निर्णायक ऐलान के बाद डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार कटघरे में आ खड़ी हुई है,प्रधानमंत्री सीधे निशाने पर हैं।
कोल ब्लाक आबंटन मामले में सीबीआई की कार्यवाही में दखलंदाजी के मामले में भी विवादों में घिरे प्रधानमंत्री को अपनी ही पार्टी का निशाना बनना पड़ा था और अपने सबसे अजीज कानून मंत्री अश्विनी कुमार का इस्तीफा लेना पड़ा था। रेलवे घूसकांड में भी प्रधानमंत्री को मजबूरी में रेलमंत्री बंसल का इस्तीफा लेना पड़ा था। इस अध्यादेश के मामले में राहुल गांधी के तेवर के बाद एक संदेश तो साफ है कि अब पार्टी को अपने प्रधानमंत्री और सरकार पर भरोसा नहीं रह गया है। तो क्या विदेश दौरे पर गए प्रधानमंत्री लौटते ही इस्तीफे की पेशकस कर सकते है यह सवाल देश के राजनीतिक गलियारों का आज सबसे बड़ा प्रश्न हैं। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कभी यह कह कर सनसनी फैला दी थी कि सत्ता के दो केंद्र है हालांकि कांग्रेस ने इसे खारिज किया था लेकिन शुक्रवार को राहुल गांधी ने जिस तरह सरकार और समूचे मंत्रिमंड़ल को कटघरे में खड़ा कर दिया उससे यह तो साफ हो गया है कि सत्ता के दो केंद्र बन चुके हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि राहुल गांधी ने जिस तरह इस अध्यादेश को खारिज किया है उसके पीछे कोई ठोस रणनीति काम कर रही है माना जा रहा है कि अध्यादेश को राष्ट्रपति के पास भेजे जाने के बाद जब भाजपा के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात कर अध्यादेश को निरस्त करने की मांग की और राष्ट्रपति ने तीन केंद्रीय मंत्रियों गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे, कानून मंत्री कपिल सिब्बल और संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ को तलब कर उनसे अध्यादेश पर चर्चा की तभी इस इस नाटकीय घटनाक्रम की पटकथा तैयार हो चुकी थी। 26 सितंबर को जब भाजपा नेताओं ने राष्ट्रपति से मुलाकात की उसी के तुरंत बाद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इस अध्यादेश के खिलाफ अपनी आवाज उठा दी थी। कांग्रेस के सूत्रों की मानें तो राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का अध्यादेश विरोधी रुख भांप कर कांग्रेस सक्रिय हो गयी और शुक्रवार को प्रेस क्लब आॅफ इंडिया में कांग्रेस के मीडिया प्रभारी की एक हप्ते पहले से तय प्रेस से मिलिए कार्यक्रम में राहुल गांधी ने अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी खबर तैयार कर दी। कांग्रेस उपाध्यक्ष और कांग्रेस के पीएम इन वेटिंग राहुल गांधी के इस कदम को राजनीतिक हल्कों में एक तीर से कई निशाने बेधने की कोशिश माना जा रहा है। अब यदि अध्यादेश वापस लिया जाता है जिसकी संभावना सौ प्रतिशत है तो राहुल गांधी बिना किसी औपचारिक ऐलान के पार्टी के सुप्रीमो साबित हो जाएगें। नंबर दो आज तक किसी भी राष्ट्रीय मुद्दे पर मुंह न खोलने वाले राहुल की छवि एकाएक चमकने लगेगी और वे किसी औपचारिक ऐलान के भाजपा के पीएम इन वेटिंग के मुकाबले खड़े नजर आने लगेंगे तीसरा और अंतिम निशाना यह हो सकता है कि तमाम तरह के भ्रष्टाचारों के आरोपो से जूझ रही यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को यह संकेत चला जाए कि अब वे स्वेच्छा से प्रधानमंत्री पद छोड़ दें तो कांग्रेस के हित में होगा। सवाल यह भी उठता है कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह क्या करेंगे। यह तो उन्होंने कह ही दिया है कि वे स्वदेश लौटते ही कैबिनेट की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा करके फैसला लेंगे। तो अब फिर वही सवाल होगा कि वे क्या फैसला लेंगे ? क्या राहुल के दबाव को खारिज कर अपने फैसले पर कायम रहेंगे ? या मामले की लीपापोती करते हुए कुछ जिम्मेदार मंत्रियों पर ठीकरा फोड़ उनका इस्तीफा लेकर सत्ता का सुख लेते रहेंगे या फिर मंत्रिमंडल की बैठक में सत्ता और नैतिकता को तराजू में तोलते हुए सरकार का इस्तीफा दे देंगे?
अरुण खरे
दागी सांसदों व विधायकों को बचाने वाले अध्यादेश के खिलाफ कांग्रेस के सबसे ताकतवर नेता राहुल गांधी के नाटकीय निर्णायक ऐलान के बाद डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार कटघरे में आ खड़ी हुई है,प्रधानमंत्री सीधे निशाने पर हैं।
कोल ब्लाक आबंटन मामले में सीबीआई की कार्यवाही में दखलंदाजी के मामले में भी विवादों में घिरे प्रधानमंत्री को अपनी ही पार्टी का निशाना बनना पड़ा था और अपने सबसे अजीज कानून मंत्री अश्विनी कुमार का इस्तीफा लेना पड़ा था। रेलवे घूसकांड में भी प्रधानमंत्री को मजबूरी में रेलमंत्री बंसल का इस्तीफा लेना पड़ा था। इस अध्यादेश के मामले में राहुल गांधी के तेवर के बाद एक संदेश तो साफ है कि अब पार्टी को अपने प्रधानमंत्री और सरकार पर भरोसा नहीं रह गया है। तो क्या विदेश दौरे पर गए प्रधानमंत्री लौटते ही इस्तीफे की पेशकस कर सकते है यह सवाल देश के राजनीतिक गलियारों का आज सबसे बड़ा प्रश्न हैं। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कभी यह कह कर सनसनी फैला दी थी कि सत्ता के दो केंद्र है हालांकि कांग्रेस ने इसे खारिज किया था लेकिन शुक्रवार को राहुल गांधी ने जिस तरह सरकार और समूचे मंत्रिमंड़ल को कटघरे में खड़ा कर दिया उससे यह तो साफ हो गया है कि सत्ता के दो केंद्र बन चुके हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि राहुल गांधी ने जिस तरह इस अध्यादेश को खारिज किया है उसके पीछे कोई ठोस रणनीति काम कर रही है माना जा रहा है कि अध्यादेश को राष्ट्रपति के पास भेजे जाने के बाद जब भाजपा के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात कर अध्यादेश को निरस्त करने की मांग की और राष्ट्रपति ने तीन केंद्रीय मंत्रियों गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे, कानून मंत्री कपिल सिब्बल और संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ को तलब कर उनसे अध्यादेश पर चर्चा की तभी इस इस नाटकीय घटनाक्रम की पटकथा तैयार हो चुकी थी। 26 सितंबर को जब भाजपा नेताओं ने राष्ट्रपति से मुलाकात की उसी के तुरंत बाद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इस अध्यादेश के खिलाफ अपनी आवाज उठा दी थी। कांग्रेस के सूत्रों की मानें तो राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का अध्यादेश विरोधी रुख भांप कर कांग्रेस सक्रिय हो गयी और शुक्रवार को प्रेस क्लब आॅफ इंडिया में कांग्रेस के मीडिया प्रभारी की एक हप्ते पहले से तय प्रेस से मिलिए कार्यक्रम में राहुल गांधी ने अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी खबर तैयार कर दी। कांग्रेस उपाध्यक्ष और कांग्रेस के पीएम इन वेटिंग राहुल गांधी के इस कदम को राजनीतिक हल्कों में एक तीर से कई निशाने बेधने की कोशिश माना जा रहा है। अब यदि अध्यादेश वापस लिया जाता है जिसकी संभावना सौ प्रतिशत है तो राहुल गांधी बिना किसी औपचारिक ऐलान के पार्टी के सुप्रीमो साबित हो जाएगें। नंबर दो आज तक किसी भी राष्ट्रीय मुद्दे पर मुंह न खोलने वाले राहुल की छवि एकाएक चमकने लगेगी और वे किसी औपचारिक ऐलान के भाजपा के पीएम इन वेटिंग के मुकाबले खड़े नजर आने लगेंगे तीसरा और अंतिम निशाना यह हो सकता है कि तमाम तरह के भ्रष्टाचारों के आरोपो से जूझ रही यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को यह संकेत चला जाए कि अब वे स्वेच्छा से प्रधानमंत्री पद छोड़ दें तो कांग्रेस के हित में होगा। सवाल यह भी उठता है कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह क्या करेंगे। यह तो उन्होंने कह ही दिया है कि वे स्वदेश लौटते ही कैबिनेट की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा करके फैसला लेंगे। तो अब फिर वही सवाल होगा कि वे क्या फैसला लेंगे ? क्या राहुल के दबाव को खारिज कर अपने फैसले पर कायम रहेंगे ? या मामले की लीपापोती करते हुए कुछ जिम्मेदार मंत्रियों पर ठीकरा फोड़ उनका इस्तीफा लेकर सत्ता का सुख लेते रहेंगे या फिर मंत्रिमंडल की बैठक में सत्ता और नैतिकता को तराजू में तोलते हुए सरकार का इस्तीफा दे देंगे?
30 सितंबर 2013

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