Friday, October 18, 2013

डगमगाने लगे लोजपा सुप्रीमों के कदम !

मोदी की आंधी से बिहार में राजग की शरण गहने की होड़

अरुण खरे 
ठंड की दस्तक के साथ गर्म हो रही मोदी की हवाओं ने देश की चुनावी फिजां की रंगत बदलना क्या शुरू किया तमाम छोटे दल और मुख्यधारा से छिटके राजनीतिक नेताओं ने रंग बदलना शुरू कर दिया है। इस दौड़ में बिहार कहीं आगे दिख रहा है। लग·fग स·fe  सत्ताओं का स्वाद चख चुके लोकजनशक्ति पार्टी के सुप्रीमो रामविलास पासवान के कदम भी  इस गर्म हवा ने डिगा दिए हैं।
इसी माह होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव की सरगर्मियों ने राजनीतिक दलों को अपने समीकरणों को बदलने के लिए पूरी जमीन तैयार कर दी है। क·fe बिहार के किंग रहे  राष्ट्रीय जनता पार्टी के प्रमुख लालू यादव के चारा घोटाले में जेल जाने के बाद जहां उनकी ताकत बढ़ती दिख रही है वहीं राजग से नाता तोड़ने वाले जद यू की हवा बिहार में खराब होती जा रही है इसे भाँप कर वहां के राजनीतिक दलों को लगने लगा है कि वे मोदी के नाम पर आंधी में बदल रही हवा का दामन थाम कर चुनावी वैतरणी पार कर सकते है इसी के चलते बिहार के राजनीतिक दलों में राजग का दामन थामने की एक प्रतिर्स्पधा सी शुरू हो गयी है अनेक राजनीतिक नेता किसी न किसी तरह भाजपा नेताओं से अपने पुराने संपर्को का हवाला देकर नए समीकरण बनाने में जुट गए हैं।
सूत्रों के मुताबिक कभी जनता दल से सांसद रहे और जद यू से नाता तोड़ चुके पूर्व सांसद उपेंन्द्र कुशवाहा ने एक पार्टी राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी का गठन किया था उनके साथ एक पूर्व सांसद अरुण कुमार भी है इन्होंने तो वाकयदा पिछले दिनों नालंदा में अपनी पार्टी की कार्यकारिणी में राजग से नाता जोड़ने का प्रस्ताव तक पास कर लिया। सूत्र बताते हैं कि ·ffजपा में ·fe इनको साथ लेने की चर्चा शुरू हो गयी है। एक अन्य जद यू के महासचिव रहे और अब एक नई पार्टी के मुखिया शम्भूशरण श्रीवास्तव भी मौके का पूरा फायदा उठाना चाहते हैं ये भी राजग के साथ जाने की लाइन में लग गए हैं। श्रीवास्तव ने तो राजग के संयोजक रहे जार्ज फ र्नांडिस के पुराने सहयोगियों से संपर्क साधना शुरू कर दिया है। इनकी पार्टी के सूत्रों का दावा है कि जद यू के कई नेता भी इनके  संपर्क में है और वे भी राजग के साथ ही चुनावी मैदान में उतरना चाहते हैं। इसके लिए इन्होंने समता मंच का ·fe गठन किया है।
सूत्रों का दावा है कि कांग्रेस की यूपीए सरकार को बिना शर्त समर्थन कर रहे लोजपा के प्रमुख रामविलास पासवान भी इन दिनों राजनीतिक घटनाक्रम पर पूरी नजर रखे हुए हैं। राजद के लालू प्रसाद यादव का हश्र देखकर धर्मनिरपेक्षता की बांसुरी बजा रहे रामविलास पासवान के कदम भी लालू प्रसाद यादव के जेल जाने के बाद डगमगाने लगे हैं। पिछले पांच साल से लगातार यूपीए दो को बिना शर्त समर्थन दे रहे रामविलास पासवान चाहते हैं कि कांग्रेस में उन्हें और उनके पुत्र को संरक्षण मिले । सूत्रों का दावा है कि पिछले चार साल से वे यही कोशिश कर रहे थे लेकिन कांग्रेस का दिल नहीं पसीजा वहीं उनकी पार्टी के नेताओं को भी अब लगने लगा है कि लालू के जेल जाने के बाद लालू की मदद से थोड़ी बहुत चल रही उनकी दुकान का भी शटर गिरने वाला है परिणाम यह है कि पासवान पर यह दबाव बढ़ने लगा है कि वे मौके का लाउठाए और भाजपा के नेतृत्व वाले राजग एक बार फिर दामन थाम कर चुनाव वैतरणी को पार करें।
जोलपा के सूत्र बताते हैं कि रामविलास पासवान भी चाहते तो यही है कि किसी न किसी तरह राजग में उनकी वापसी हो जाए लेकिन उनके सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि जिस गुजरात और मोदी की वजह से उन्होंने राजग को अलविदा कहा था उसे ही कैसे स्वीकार कर लें? पासवान के बेहद करीबी सूत्रों का मानना है कि पासवान  चाहते तो यही है कि वे अब कांग्रेस से हाथ छुटा कर राजग में चले जाए उन्हें राजग से परहेज भी नहीं है लेकिन मोदी के उस मुद्दे से कैसे पीछा छुडाएं जिसकी वजह से उन्होंने राजग छोड़ा था। हालांकि अब पार्टी के कुछ नेता इस सवाल पर कि जिस गुजरात दंगे के मुद्दे पर लोजपा ने राजग छोड़ी वे पुन: उसी में शामिल हो जाएंगे? इस सवाल पर एक नेता का कहना है कि लोजपा ने गुजरात के दंगा मुद्दे पर नहीं वरन अन्य राजनीतिक कारणों से राजग से नाता तोड़ा था। इस जबाव से तो साफ है कि पासवान कांग्रेस से निराश हो कर या कांग्रेस पर दबाव बनाने के लिए अब लोजपा के राजग का हाथ थामने की चिंगारी को हवा दे रहे हैं। यहां सवाल उठता है कि 2002 गुजरात दंगों के कारण राजग से नाता तोड़ने वाले रामविलास पासवान अपने और अपने पुत्र जिसे वे राजनीति में लाना चाहते हैं के लिए कांग्रेस में बर्थ तलाश रहे हैं या कांग्रेस से पूरी तरह निराश होकर राजग का दामन थाम अपनी राजनीतिक हैसियत को किसी न किसी तरह बनाए रखना चाहते हैं। उधर उप्र में भी कई दल भाजपा का दामन का थामने की कोशिशों में जुट गए है। सूत्रों की मानें तो कई बड़े मुसलिम नेता भी भाजपा से संपर्क साधने की कवायद में जुट गए हैं।
18Oct-2013


Thursday, October 3, 2013

तो राहुल अब मोदी से दो-दो हाथ के लिए तैयार !

सरकार और संगठन में राहुल की सर्वोच्चता साबित
अरुण खरे

शुक्रवार की दोपहर जो राजनीतिक चक्रवात प्रेस क्लब आॅफ इंडिया के परिसर से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बयान के बाद उठा था वह पूरे 124 घंटे तक समूची यूपीए सरकार और उसकी नेता कांग्रेस को हिलाने के बाद बुधवार की शाम सात बजे शांत हो गया। छह दिन के इस महामंथन के बाद तमाम भ्रष्टाचारों के आरोपों से धिरी कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का माद्दा रखने वाले मिस्टर क्लीन नेता के रूप में निखर कर सामने आ गए है। दागी सांसदों को बचाने के लिए लाया गया अध्यादेश व विधेयक सचमुच कूड़े के ढेर में बदल गया। शुक्रवार को एक नाटकीय घटनाक्रम में राहुल गांधी ने अपनी पार्टी के मीडिया प्रमुख अजय माकन की प्रेस कांफ्रेंस में एकायक पहुँच कर यूपीए सरकार के अध्यादेश को बकवास बताते हुए उसे फाड़कर कूडे में फेंकने लायक कह कर प्रधानमंत्री और संगठन की सर्वोच्चता को चुनौती दे डाली थी। इस पूरे घटनाक्रम ने साबित कर दिया है कि राहुल गांधी इसी मिस्टर क्लीन की चमकदार छवि के साथ अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार राजनीति में मंजे और तपे हुए नरेंद्र मोदी से दो-दो हाथ करने के लिए पूरी तरह तैयार हो गए हैं।
शुक्रवार के राहुल गांधी के बयान और तेवर देखने के बाद देश भर की नजरें प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह की स्वदेश वापसी और उनकी प्रतिक्रिया पर टिकी थी। लेकिन वही हुआ जो देश के लोगों को पहले से ही नजर आ रहा था। हरिभूमि ने भी सोमवार को यह लिखा था कि प्रधानमंत्री की स्वदेश वापसी पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी नाराज प्रधानमंत्री से मुलाकात कर उनसे अपने किए की माफी मांग सकते है और प्रधानमंत्री भी हमेशा की तरह सब कुछ भूल कर कैबिनेट की बैठक बुलाकर अध्यादेश वापस लेकर कांग्रेस के युवराज की सर्वोच्च के दावे पर अपनी मुहर लगा सकते है और हुआ भी ठीक ऐसा ही। इन छह दिनों के घटनाक्रम से एक बात तो साफ हो गयी है कि कांग्रेस अध्यक्ष भले ही श्रीमती सोनिया गांधी हो लेकिन संगठन की बागडोर अब पूरी तरह राहुल गांधी के हाथ में आ चुकी है और संगठन कैसे चलाया जाएगा इस पर उनकी ही अंतिम मुहर अब मान्य होगी। कांग्रेस उपाध्यक्ष के इस कदम और समूची पार्टी के उनके पीछे आ खड़े होने ने उन्हें आगामी लोकसभा चुनाव का नेता अपने आप ही सिद्व कर दिया है। कांग्रेस ने भले ही भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के मुकाबले राहुल गांधी के नाम का ऐलान न किया हो लेकिन अपनी राजनीतिक पारी में पहली बार किसी राजनीतिक मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से अपनी निर्णायक प्रतिक्रिया देकर राहुल गांधी ने अपनी नई भूमिका से पर्दा उठा दिया है।
03Oct-2013

Wednesday, October 2, 2013

देश की निगाहें टिकी, कौन है कांग्रेस का बॉस

प्रधानमंत्री का स्वेदश आगमन आज
अरुण खरे

सारे देश की निगाहें आने वाले कल के घटनाक्रमों और बदलने वाले राजनीतिक परिदृश्य की कल्पना में खोई है। मंगलवार को दोपहर बाद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह न्यूयार्क से स्वदेश पहुंचने वाले हैं। उनकी अनुपस्थिति में शुक्रवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एक नाटकीय घटनाक्रम में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाले मंत्रिमंड़ल के दागियों को बचाने वाले एक अध्यादेश को बकवास करार देकर सरकार को संकट में डाल दिया है।
अब कांग्रेस सहित देश भर को अगले एक दो दिनों के घटनाक्रम की प्रतीक्षा है। क्या कांग्रेस के पीएम इन वेटिंग राहुल गांधी पार्टी के सर्वोच्च नेता साबित हो जाएंगे या प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कांग्रेस की सोच को दरकिनार कर अध्यादेश के पीछे जमकर खड़े रहेंगे या पार्टी के कूटनीतिक विशेषज्ञ बीच का कोई रास्ता निकालेंगे। कांग्रेस में हालांकि सोमवार को कोई भी बड़ा नेता इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से बचता रहा लेकिन कर्नाटक के मांड्या में सोमवार को ही पार्टी की रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने साफ कर दिया कि पूरी कांग्रेस पार्टी प्रधानमंत्री के साथ खड़ी है। इस थोड़ा बदले घटनाक्रम से यह संकेत भी जाता है कि शायद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कोई बड़ी प्रतिक्रिया न देने का मन बना चुके हैं। सूत्रों की मानें तो पार्टी में राहुल गांधी के बयान को लेकर दो खेमें बन चुके हैं एक पीएम के पक्ष में दूसरा राहुल गांधी के समर्थन में। हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के कर्नाटक में दिए भाषण के बावजूद कांग्रेस में अभी तक कहीं से प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के फैसले का बचाव की आवाज नहीं उठी है। इस सारे घटनाक्रम में अब लोगों और तमाम राजनीतिक दलों के बीच इस बात की प्रतीक्षा की जा रही है कि कांग्रेस का असली और वास्तबिक नेता कौन साबित होता है, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी?, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी या प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह? कांग्रेस के भीतर मचे इस घमासान में सबकी नजरें इस पर लगी हैं कि अगले दो दिन में क्या होता है। लोगों के जेहन में अनेक सवाल जन्म ले रहे हैं कि क्या राहुल गांधी के बयान से आहत प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह इस्तीफा दे देंगे और कांग्रेस उनकी जगह किसी को नया प्रधानमंत्री नियुक्त कर देगी? क्या सोमवार को कर्नाटक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पीएम के पक्ष में खडे होने की घोषणा के बाद मंगलवार को राहुल गांधी प्रधानमंत्री से अपने बयान के लिए क्षमा मांग कर मामले को खत्म कर देंगे और प्रधानमंत्री भी कैबिनेट की बैठक बुलाकर अध्यादेश वापस लेने का फैसला कर लेंगे? एक संभावना और भी व्यक्त की जा रही है कि पिछले चार साल से लगातार पार्टी के भीतर अपनी अवमानना से आहत प्रधानमंत्री इस्तीफा देने से न केवल इंकार कर दें वरन अध्यादेश पर भी अड़ जाएं? ज्यादा जोर पड़ने पर मंत्रिमंडल का इस्तीफा ही राष्ट्रपति को सौंप कर आम चुनाव का रास्ता साफ कर दें? उधर कुछ सूत्रों का दावा है कि पहली बार किसी राष्ट्रीय  मसले पर सार्वजनिक रूप से बोलने वाले कांग्रेस उपाध्यक्ष किसी भी हालत में न तो अपना बयान वापस लेने को तैयार होगे और न ही अध्यादेश को लागू करने के पक्ष में तैयार होंगे। यदि सचमुच ऐसा होता है तो क्या होगा? इसी पर देश की निगाह टिकी है।
01Oct- 2013

सरकार पर पार्टी का भरोसा नहीं

अब गेंद प्रधानमंत्री के पाले में
अरुण खरे 

दागी सांसदों व विधायकों को बचाने वाले अध्यादेश के खिलाफ कांग्रेस के सबसे ताकतवर नेता राहुल गांधी के नाटकीय निर्णायक ऐलान के बाद डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार कटघरे में आ खड़ी हुई है,प्रधानमंत्री सीधे निशाने पर हैं।
 कोल ब्लाक आबंटन मामले में सीबीआई की कार्यवाही में दखलंदाजी के मामले में भी विवादों में घिरे प्रधानमंत्री को अपनी ही पार्टी का निशाना बनना पड़ा था और अपने सबसे अजीज कानून मंत्री अश्विनी कुमार का इस्तीफा लेना पड़ा था। रेलवे घूसकांड में भी प्रधानमंत्री को मजबूरी में रेलमंत्री बंसल का इस्तीफा लेना पड़ा था। इस अध्यादेश के मामले में राहुल गांधी के तेवर के बाद एक संदेश तो साफ है कि अब पार्टी को अपने प्रधानमंत्री और सरकार पर भरोसा नहीं रह गया है। तो क्या विदेश दौरे पर गए प्रधानमंत्री लौटते ही इस्तीफे की पेशकस कर सकते है यह सवाल देश के राजनीतिक गलियारों का आज सबसे बड़ा प्रश्न हैं। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कभी यह कह कर सनसनी फैला दी थी कि सत्ता के दो केंद्र है हालांकि कांग्रेस ने इसे खारिज किया था लेकिन शुक्रवार को राहुल गांधी ने जिस तरह सरकार और समूचे मंत्रिमंड़ल को कटघरे में खड़ा कर दिया उससे यह तो साफ हो गया है कि सत्ता के दो केंद्र बन चुके हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि राहुल गांधी ने जिस तरह इस अध्यादेश को खारिज किया है उसके पीछे कोई ठोस रणनीति काम कर रही है माना जा रहा है कि अध्यादेश को राष्ट्रपति के पास भेजे जाने के बाद जब भाजपा के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति  प्रणब मुखर्जी से मुलाकात कर अध्यादेश को निरस्त करने की मांग की और राष्ट्रपति  ने तीन केंद्रीय मंत्रियों गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे, कानून मंत्री कपिल सिब्बल और संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ को तलब कर उनसे अध्यादेश पर चर्चा की तभी इस इस नाटकीय घटनाक्रम की पटकथा तैयार हो चुकी थी। 26 सितंबर को जब भाजपा नेताओं ने राष्ट्रपति से मुलाकात की उसी के तुरंत बाद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इस अध्यादेश के खिलाफ अपनी आवाज उठा दी थी। कांग्रेस के सूत्रों की मानें तो राष्ट्रपति  प्रणब मुखर्जी का अध्यादेश विरोधी रुख भांप कर कांग्रेस सक्रिय हो गयी और शुक्रवार को प्रेस क्लब आॅफ इंडिया में कांग्रेस के मीडिया प्रभारी की एक हप्ते पहले से तय प्रेस से मिलिए कार्यक्रम में राहुल गांधी ने अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी खबर तैयार कर दी। कांग्रेस उपाध्यक्ष और कांग्रेस के पीएम इन वेटिंग राहुल गांधी के इस कदम को राजनीतिक हल्कों में एक तीर से कई निशाने बेधने की कोशिश माना जा रहा है। अब यदि अध्यादेश वापस लिया जाता है जिसकी संभावना सौ प्रतिशत है तो राहुल गांधी बिना किसी औपचारिक ऐलान के पार्टी के सुप्रीमो साबित हो जाएगें। नंबर दो आज तक किसी भी राष्ट्रीय  मुद्दे पर मुंह न खोलने वाले राहुल की छवि एकाएक चमकने लगेगी और वे किसी औपचारिक ऐलान के भाजपा के पीएम इन वेटिंग के मुकाबले खड़े नजर आने लगेंगे तीसरा और अंतिम निशाना यह हो सकता है कि तमाम तरह के भ्रष्टाचारों के आरोपो से जूझ रही  यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को यह संकेत चला जाए कि अब वे स्वेच्छा से प्रधानमंत्री पद छोड़ दें तो कांग्रेस के हित में होगा। सवाल यह भी उठता है कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह क्या करेंगे। यह तो उन्होंने कह ही दिया है कि वे स्वदेश लौटते ही कैबिनेट की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा करके फैसला लेंगे। तो अब फिर वही सवाल होगा कि वे क्या फैसला लेंगे ? क्या राहुल के दबाव को खारिज कर अपने फैसले पर कायम रहेंगे ? या मामले की लीपापोती करते हुए कुछ जिम्मेदार मंत्रियों पर ठीकरा फोड़ उनका इस्तीफा लेकर सत्ता का सुख लेते रहेंगे या फिर मंत्रिमंडल की बैठक में सत्ता और नैतिकता को तराजू में तोलते हुए सरकार का इस्तीफा दे देंगे?
30 सितंबर 2013